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  • rina56 7:10 am on December 31, 2009 परमालिंक | Reply
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    ‘नेताजी’ 

    अब तो,वदल जाओ;

    लगे॒ हैं,जागने हम भी

    अधिक न इतराओ‘;

    समय की मांगकहकर

    ,अब हमें बहकाओ;

    नेताजीकरो नेतागिरी

    लेकिन,संभल जाओ;

    भाषा और बोली से

    ,हम को अलगाओ;

    ऊब चूके हैहम-सब‘;

    हमें,अब मत भटकाओ

    हो सके तो,हम सबको;

    करीब लाओ, प्यार से

    अपने देश को अपनाओ;

    प्रेम व अशिर्बाद से

    अपना ताज सजाओ;

    अब वोट बैंक छोडो

    देश को फिर से जोड़ो

     
  • rina56 2:32 am on November 16, 2009 परमालिंक | Reply
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    कहने को यहाँ पर लोकतंत्र का शासन है. पहले यह कहावत नेहरु परिवार की थी, पर अब तो कोई भी चुनाव हो चाहे वो लोकसभा, राज्यसभा, कॉरपोरेट या फिर पंचायत – सभी स्थान पर यदि पिता पहले से कोई भी राज्य पद पर हो तब तो टिकेट मिलना ही है.एक ही घर में पिता,पुत्र[यदि दो तिन हो ]तो भी समस्या नहीं.अरे अभी ख़त्म नहीं हुआ, इसके बाद पत्नी, पुत्रवधू,या बेटी तिस पर भी बस नहीं,” इसके बाद रिश्तेदार यानि भाई- बहन या बहनोई- कुछ भी चलेगा”.आप के पास कोई चारा नहीं भले आप अपना मत देना चाहे या न.जो चुनाव के लिए खड़े है, वहां आप के पास विचार करने योग्य कुछ बचा ही नहीं. कैसे बचा जाय इस तानाशाही प्रक्रिया से.अधिक से अधिक निर्दलीय हो कर चुनाव के मैदान में आयें.एक न एक दिन परिवर्तन होगा समय लगेगा.समस्याएँ अनेक होंगी जैसे प्रचार के लिए धन इत्यादि. पाठक यदि मेरी राय से सहमत हो तो अपना विचार व्यक्त अवश्य करे.अन्यथा देश पर लोकतंत्र का लेबल, एक गाली बन कर रह जाएगी. मेरे पास और कोई माध्यम नहीं है, आप सब तक पहुंचने के लिये

     
  • rina56 7:41 am on August 3, 2009 परमालिंक | Reply
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    मेरी व्यथा देश की हालत कर रहे है बयान:… 

    मेरी व्यथा

    देश की हालत
    कर रहे है बयान:
    जान की बाजी लगा
    रहें हमारे जवान:

    पर कब तक देंगे
    हम कुर्बानी:
    शहीदों के परिवार की
    है, ‘यह कहानी’:

    पहले बाँट दिया
    हमारा हिन्दोस्तान:
    सियासतों के चाल ने
    न रक्खा हमारा मान:

    फिर बाँट दिया
    हमारे धर्म को:
    संदेह से देखते
    हम एक दूसरे को:

    बाकी बचा था प्रदेश
    उसे भी बाँट दिया:
    राज नेताओ ने जमकर
    इसका ताज लिया

    हर घटनाओ के
    बाद होता है घोषणा:
    करोरो का हो चाहे
    हमें है रोकना:

    कहते है यहाँ
    पर है ‘लोकतंत्र’:
    पर, चल रहे है सब
    जैसे मशीनी यंत्र:

    ‘कर’ देना ही है
    अब हमारा काम:
    क्यों की हम सब है
    सिर्फ —–आम:

    धनी हो गए, यहाँ
    हमारे सभी लीडर:
    अंग रक्षक है,इनके
    चलते है निडर:

    सच्चा नेता एक दिन
    अवश्य आगेगा:
    देश की को स्तिथि
    फिर से बदलेगा:

    गांधीजी,शाश्त्रीजी
    जैसा कोई मिले:
    जिस से, देश फिर
    कभी न हिले:

    वब्दे मातरम

     
  • rina56 8:54 pm on May 29, 2009 परमालिंक | Reply
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    एक बूंद बरसात की

    मन बड़ा दुखी है.बहुत उम्मीद लेकर आई थी, केवल दो शब्द प्यार के मिल जाए तो, खुश हो जाऊ.अभी तो केवल बुढ़ापे ने दरवाजे पर केवल दस्तक ही दिया है.किसी भी प्रकार से निर्भर नहीं हूँ, किसी पर.हाय यह कैसी है बिडम्बना ! धरा पर गिरने के पहले ही ज़र्रे ने किया प्रहार.मै कुछ देने की आशा से पृथ्वी की और चली थी,सोचा था, महि से मिलकर कुछ उसका दुःख बाटूंगी और कुछ उसके सुख में शामिल होकर, थोड़ा सुखी हो जाने की चाहत लेकर चली थी.
    अपनी थी स्थूल सी काया,अपने अंदर पानी जो था.इस प्रकार के भारी भरकम काया होते हुए भी,मन में उमंग के साथ धरा की और अग्रसर हो चली. मुझे कहाँ मालूम था,कि इस प्रकार का स्वागत होगा ? सपने में भी सोचा नहीं था.अभी तो ज़र्रे से ही पाला पड़ा था, आगे किस्से किस्से – किस्से सामना होगा मालूम नहीं. भय लग रहा है.क्या यह ही उम्र का पड़ाव? हे ईश्वर तुम तो अंतर्यामी हो,मुझे सूर्य के ताप से वाष्पित करके सदा के लिये मुक्ति दे सकते थे, पर नहीं,मुझे तो कर्मफल भोगना ही था. यदि अगला जनम हो तो इतनी यातना मत देना, बहुत दर्द होता है.मुझे शक्ति दो ताकि आने वाले पल का सामना कर सकूँ.अभी तक हड्डियाँ जर्जर नहीं है पूर्ण रूप से. इस जन्म को भोग लेने दो.आगे से शिकायत का मौका नहीं दूंगी.पर मेरी याचना ध्यान में रखना.

     
  • rina56 4:35 pm on May 19, 2009 परमालिंक | Reply
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    सफ़र 

    पिछले कुछ महीनो से विदेश में रह कर जो अनुभूति को मैंने पाया,थोडा दर्शाने की कोशिश

    आ अब घर लौट चले,

    वतन की याद सताती है,

    ”असतित्व”कैसे भूले,

    चिंतन रोके नहीं रूकती है,

     
  • rina56 9:08 pm on May 18, 2009 परमालिंक | Reply
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    यादे 

    बचपन में यह कविता, बहुत अच्छा लगता था. अब भूल गई हूँ यदि किसी को याद हो तो मुझे लिखे
    कविता यूँ थी
    हठ कर बैठा चाँद एक दिन,माँ से बोला सिलवा दे मुझे  ऊँन एक का झिंगोला

     
    • aapka kadradan 3:04 पूर्वाह्न on अक्टूबर 1, 2009 परमालिंक | Reply

      sun sun karti hawa raat bhar, jhare se mai marta hoo , thithur thitur kar kisi tarah mai, yatra poori karta hoo ………

      • rina56 10:26 पूर्वाह्न on अक्टूबर 2, 2009 परमालिंक | Reply

        आपने बचपन के यादों को याद दिलाने मे सहायता किया. तहे दिल से शुक्रिया अदा करती हूँ.
        rina56

      • rina56 11:01 अपराह्न on फ़रवरी 11, 2010 परमालिंक | Reply

        If possible write the full poem, i m also ur kadrdan

  • rina56 5:13 pm on May 11, 2009 परमालिंक | Reply
    Tags: ,   

    देशी बनाम विदेशी 

    देश को मा की संज्ञा दिया गया है.मा अपने संतान को किसी भी रूप में मरते दम तक प्यार से सींचती है.कोई भी उसके संतान की बुराई करे तो सह नहीं पाती,विद्रोह करती है,चाहे वह किसी देशकी हो.परन्तु पिछले कुछ समय से देख रही हूँ,देशी युवा अथवा युवतिया विदेश में रह कर देश को नीचा दिखाने में गर्व बोध करते है.लज्जा आती है इनहें  देख कर,देश के पैसो से पढ़ कर विदेश में सेवा करते है,धन, ऐशो-आराम सब यहाँ है,पर कहीं तो मन में है ही की हम भारतीय है .क्यों लज्जा है?समझ नहीं पाती .क्या यह ही है, इकिअस्वी सदी का परिवर्तन?

     
  • rina56 7:59 pm on April 28, 2009 परमालिंक | Reply
    Tags: ज़माना   

    zamana 

    क्या ज़माना  बदल गया है?
    या  बीते कल का साया है ;
    सोच कर भवर में फ़स्ती जाती हूँ
    तह नहीं, और भी धसती जाती हूँ ;
    क्या है सच, कोई तो बताए
    ताकि,हमें  दिखे नई दिशाए ;

     
  • rina56 3:02 pm on April 24, 2009 परमालिंक | Reply
    Tags: Nari   

    सिप की तरह ढकी थी,अच्छी थी;

    बाहर निकली तो बहुत झेलनी पड़ी

    देखा,मेरी ही साथिन मरी पड़ी थी;

     
  • rina56 2:26 pm on April 22, 2009 परमालिंक | Reply
    Tags: संसार   

    rina56 

    सागर के इस पार
    सोच रही हूँ,कहाँ है भिन्नता
    यह ही है तकरार
    जाना तो है सबको एक जगह
    न कर भाई इंकार
    येहीं पर है, सबका क्रीडांगन
    अलग नहीं है, यह संसार

     
    • रवि 6:35 पूर्वाह्न on अप्रैल 23, 2009 परमालिंक | Reply

      बढ़िया लिखा है.

    • मीनाक्षी 3:38 पूर्वाह्न on अप्रैल 26, 2009 परमालिंक | Reply

      रविरतलामीजी की चिट्टाचर्चा के माध्यम से यहाँ पहुँचे… सब को मालूम है कि सबका एक ही संसार है फिर भी तकरार करते है..इससे बडा अजूबा क्या हो सकता है.

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